मां ने जब असुरों के संहार के लिए लिया भद्रकाली का रूप, पढ़ें व्रत कथा
मां ने जब असुरों के संहार के लिए लिया भद्रकाली
का रूप, पढ़ें व्रत कथा
मां कालरात्रि कथा
पौराणिक कथा के अनुसार दैत्य शुंभ-निशुंभ
और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था. इससे चिंतित होकर सभी देवतागण भगवान
शिव जी के पास गए. शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा
करने को कहा. भगवान शिव जी की बात मानकर माता पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया
और शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया. परंतु जैसे ही माँ दुर्गा ने रक्तबीज को मारा उसके शरीर
से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न हो गए. इसे देख दुर्गा जी ने अपने तेज से कालरात्रि
को उत्पन्न किया. इसके बाद जब दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा तो उसके शरीर से निकलने
वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का
वध कर दिया.
दुर्गा सप्तशती में महिषासुर के
बध के समय मां भद्रकाली की कथा का वर्णन मिलता है. युद्ध के समय महा-भयानक दैत्य समूह
देवी को रण भूमि में आते देखकर उनके ऊपर ऐसे बाणों की वर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरूगिरि
के शिखर पर पानी की धार की बरसा रहा हो. तब देवी ने अपने बाणों से उस बाण समूह को अनायास
ही काटकर उसके घोड़े और सारथियों को भी मार डाला. साथ ही उसके धनुष तथा ध्वजा को भी
तत्काल काट गिराया. धनुष कट जाने पर उसके अंगों को अपने बाणों से बींध डाला. और माता
भद्रकाली ने शूल का प्रहार किया. उससे राक्षस के शूल के सैकड़ों टुकड़े हो गये, वह
महादैत्य प्राणों से हाथ धो बैठा.
मां कालरात्रि का मंत्र:
ॐ कालरात्रि देव्ये नमः . 108 बार इस मंत्र का जाप करें.


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